वैश्य टेकरी
पाठ्यक्रम: जीएस-1/इतिहास
सन्दर्भ
- मध्य प्रदेश सरकार ने मौर्य सम्राट अशोक से जुड़े बौद्ध स्मारकों के संरक्षण और पुनर्स्थापना का कार्य शुरू किया है। इसकी शुरुआत उज्जैन स्थित वैश्य टेकरी में नए सिरे से खुदाई के साथ हुई है।
परिचय
- सबसे बड़ा स्तूप, जिसे लोकप्रिय रूप से वैश्य टेकरी कहा जाता है, अपने आधार पर लगभग 350 फीट चौड़ा और लगभग 100 फीट ऊँचा है। इसके निकट एक छोटा स्तूप भी है, जिसे कुंभार (या कुम्हार) टेकरी कहा जाता है।
- तत्कालीन ग्वालियर राज्य के पुरातत्व विभाग द्वारा 1938–39 में की गई प्रारंभिक खुदाई में बड़े आकार की ईंटें और आहत सिक्के (Punch-marked Coins) मिले थे। इन खोजों के आधार पर पुरातत्वविदों ने इन संरचनाओं को मौर्य काल का माना।
- स्तूप गुंबदाकार संरचना होती है, जिसका पारंपरिक रूप से बौद्ध धार्मिक स्मारक के रूप में उपयोग किया जाता था। यह बुद्ध के दफन टीले का प्रतीक माना जाता है।
- “स्तूप” शब्द संस्कृत भाषा से आया है, जिसका अर्थ “ढेर लगाना” या “एकत्र करना” है। यह इन स्मारकों की टीलेनुमा संरचना को दर्शाता है।
उज्जैन में अशोक का काल
- उज्जयिनी (आधुनिक उज्जैन), चंबल की सहायक नदी क्षिप्रा के तट पर स्थित थी। यह अवंति की राजधानी और एक महत्वपूर्ण वाणिज्यिक केंद्र थी।
- इतिहासकारों के अनुसार, उज्जैन एक प्रमुख व्यापारिक चौराहा था, जो पश्चिमी तट के भड़ौच और सोपारा जैसे बंदरगाहों को पाटलिपुत्र से जोड़ने वाले व्यापार मार्गों से जुड़ा था।
- अशोक के पिता बिंदुसार ने उन्हें अवंति का उपराज्यपाल (वायसराय) बनाकर वहाँ भेजा था।
- माना जाता है कि अशोक ने लगभग एक दशक अवंति में बिताया, जहाँ उज्जैन उनका मुख्यालय था।
- उनके कार्यों को देखते हुए बाद में उन्हें उज्जैन का उपराज्यपाल नियुक्त किया गया।
स्रोत: IE
पैदल चलने का अधिकार: भारत में पैदल यात्रियों की सुरक्षा को सुदृढ़ करना
पाठ्यक्रम: जीएस-2/शासन
सन्दर्भ
- सर्वोच्च न्यायालय द्वारा फुटपाथ पर चलने के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दिए जाने के बाद, आंध्र प्रदेश 2026 में देश का पहला राज्य बन गया जिसने एक समर्पित पैदल यात्री सुरक्षा एवं सार्वभौमिक सुगम्यता नीति तैयार की।
नीति के बारे में
इस नीति में समस्या के समाधान के लिए तीन-चरणीय व्यवस्था अनिवार्य की गई है:
- सड़क सुरक्षा ऑडिट
- फुटपाथ के बुनियादी ढाँचे को ठीक करना, जिसमें अतिक्रमण हटाना भी शामिल है
- व्यवहार में बदलाव
- फुटपाथ ऑडिट: पिछले 2–3 वर्षों में जहाँ पैदल यात्रियों के घायल होने या मृत्यु की घटनाएँ अधिक हुई हैं, ऐसे कम-से-कम 15–20 पैदल यात्री ब्लैक स्पॉट को प्राथमिकता दी जाएगी।
- अधिकारियों को एक वर्ष के भीतर 20% सड़कों का सर्वेक्षण करना होगा, ताकि अतिरिक्त पैदल यात्री क्रॉसिंग की आवश्यकता की पहचान की जा सके।
- यह नीति सभी स्थानीय निकाय क्षेत्रों पर लागू होगी, जिनमें शहरी बाहरी क्षेत्र, अर्ध-शहरी क्षेत्र, उपग्रह नगर और ग्रामीण क्षेत्र शामिल हैं।
- नीति में मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 198A का उल्लेख किया गया है। इसके तहत यदि बुनियादी ढाँचे या डिजाइन की खामियों के कारण किसी पैदल यात्री की मृत्यु या दिव्यांगता होती है, तो संबंधित अधिकारी, ठेकेदार और सलाहकार पर ₹1 लाख का जुर्माना लगाया जा सकता है।
भारत में पैदल यात्री सुरक्षा की स्थिति
- वर्ष 2024 में भारत में सड़क दुर्घटनाओं में हुई 1.77 लाख मौतों में से 36,526 मौतें पैदल यात्रियों की थीं, जो सड़क दुर्घटना से होने वाली कुल मौतों का लगभग एक-पाँचवाँ हिस्सा है।
- लगभग 31% पैदल यात्री मौतें राष्ट्रीय राजमार्गों पर होती हैं। यह तेज गति वाले मार्गों और अपर्याप्त पैदल यात्री बुनियादी ढाँचे से जुड़े जोखिमों को दर्शाता है।
- पैदल यात्रियों की मौतों में दोपहिया वाहन लगभग 28% से अधिक के लिए जिम्मेदार थे। इसके बाद कार और टैक्सी लगभग 25% के लिए जिम्मेदार थे। ट्रक/लॉरी और बसों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा।
चलने का अधिकार
- भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने मनियार इलीयाज़ (Maniyar Iliyaz) @ Shaik Riyaz बनाम पी. अय्यपन ( P. Ayyappan) एवं अन्य मामले में सुरक्षित, सुव्यवस्थित और स्पष्ट रूप से निर्धारित फुटपाथों पर “चलने के अधिकार” को औपचारिक रूप से मौलिक अधिकार घोषित किया।
- चलने का यह अधिकार अनुच्छेद 19(1)(d) में प्रदत्त आवागमन की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से प्राप्त होता है।
स्रोत: IE
गर्भिणी मित्र पाठ्यक्रम
पाठ्यक्रम: जीएस-2/शासन
चर्चा में क्यों?
- अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (AIIA) ने 2026–27 शैक्षणिक सत्र के लिए गर्भिणी मित्र पाठ्यक्रम शुरू किया है।
गर्भिणी मित्र पाठ्यक्रम
- यह एक संरचित स्वास्थ्य कौशल-विकास कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य ऐसे प्रशिक्षित कर्मियों का निर्माण करना है जो गर्भावस्था और प्रसवोत्तर अवधि के दौरान महिलाओं को उचित स्वास्थ्य शिक्षा, जीवनशैली संबंधी मार्गदर्शन और सामुदायिक स्तर पर सहायता प्रदान कर सकें।
- प्रत्येक बैच में 20 विद्यार्थियों को प्रवेश दिया जाएगा।
यह कार्यक्रम आयुर्वेद की पारंपरिक अवधारणाओं पर आधारित है:
- गर्भिणी परिचर्या — प्रसवपूर्व देखभाल
- सूतिका परिचर्या — प्रसवोत्तर देखभाल
- गर्भाधान विधि — गर्भधारण से पूर्व की देखभाल
इसमें प्रतिभागियों को निम्नलिखित व्यावहारिक कौशलों का प्रशिक्षण दिया जाएगा:
- गर्भावस्था की विभिन्न तिमाहियों के अनुसार आहार-विज्ञान
- जीवनशैली में आवश्यक बदलाव
- गर्भावस्था के लिए सुरक्षित योग
- प्रसव के दौरान भावनात्मक सहयोग
- नवजात शिशु की मालिश
- बुनियादी जीवन रक्षक सहायता (Basic Life Support) प्रोटोकॉल
- यह पाठ्यक्रम सरिता विहार, नई दिल्ली स्थित AIIA परिसर में संचालित किया जाएगा।
पात्रता
- भारत के किसी भी मान्यता प्राप्त बोर्ड से सीनियर सेकेंडरी (10+2) परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले तथा कम-से-कम 18 वर्ष की आयु वाले उम्मीदवार आवेदन कर सकते हैं।
- जो उम्मीदवार वर्तमान में कक्षा 12वीं के परिणाम की प्रतीक्षा कर रहे हैं, वे भी अनंतिम आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं।
स्रोत:PIB
भारत में पॉलीसिलिकॉन का विनिर्माण
पाठ्यक्रम: जीएस-3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
सन्दर्भ
- सरकार पॉलीसिलिकॉन विनिर्माण के लिए नई उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना पर विचार कर रही है, जिसका उद्देश्य एकीकृत घरेलू सौर फोटोवोल्टिक (PV) आपूर्ति शृंखला विकसित करना है।
भारत की सौर विनिर्माण स्थिति
- भारत में लगभग 163 गीगावाट (GW) स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता है, जिससे सौर ऊर्जा देश में नवीकरणीय ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत बन गई है।
भारत ने सौर ऊर्जा के डाउनस्ट्रीम विनिर्माण में पर्याप्त क्षमता विकसित की है:
- लगभग 173 GW सौर मॉड्यूल विनिर्माण क्षमता
- लगभग 25–30 GW सौर सेल विनिर्माण क्षमता
- हालाँकि, घरेलू विनिर्माण अभी भी अपूर्ण है, क्योंकि निर्माता मुख्य रूप से आयातित पॉलीसिलिकॉन, इंगट और वेफर पर निर्भर हैं।
- चीन वैश्विक फोटोवोल्टिक (PV) आपूर्ति क्षमता के 85% से अधिक पर नियंत्रण रखता है और सौर विनिर्माण की पूरी आपूर्ति शृंखला में उसकी एकीकृत उपस्थिति है।
पॉलीसिलिकॉन क्या है?
- पॉलीसिलिकॉन सिलिकॉन का अत्यधिक शुद्ध रूप है, जिसका उपयोग क्रिस्टलीय सिलिकॉन सौर सेल के निर्माण के लिए मूल सामग्री के रूप में किया जाता है।
- इसे क्वार्ट्ज/सिलिका जैसे सिलिकॉन-युक्त कच्चे माल से ऊर्जा-गहन शुद्धिकरण प्रक्रियाओं के माध्यम से तैयार किया जाता है।
- सौर-ग्रेड पॉलीसिलिकॉन के लिए अत्यधिक उच्च शुद्धता आवश्यक होती है, क्योंकि इसमें मौजूद अशुद्धियाँ सौर सेल के प्रदर्शन को प्रभावित कर सकती हैं।


स्रोत: The Print
आईएनएस मंगरोल
पाठ्यक्रम: जीएस-3/रक्षा
सन्दर्भ
- ‘मंगरोल’, कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (CSL), कोच्चि द्वारा निर्मित तीसरा उथले जल में पनडुब्बी रोधी युद्धक पोत (Anti-Submarine Warfare Shallow Water Craft) है, जिसे भारतीय नौसेना को सौंप दिया गया।
परिचय
- मंगरोल का नाम गुजरात के तटीय शहर और छोटे बंदरगाह ‘मंगरोल’ के नाम पर रखा गया है, जो समुद्री मत्स्य उद्योग का एक प्रमुख केंद्र है।
- यह पोत पूर्ववर्ती आईएनएस मंगरोल की विरासत को भी आगे बढ़ाता है। आईएनएस मंगरोल एक भारतीय नौसेना का माइनस्वीपर (Mine Sweeper) था, जो 2004 तक सेवा में रहा।
इस पोत में 80% से अधिक स्वदेशी सामग्री है। यह निम्नलिखित कार्यों के लिए सक्षम है:
- पानी के भीतर निगरानी
- तटीय जल में पनडुब्बी रोधी युद्ध (ASW) अभियान
- कम तीव्रता वाले समुद्री अभियान (LIMO)
- माइन युद्ध क्षमता
- पोत को वॉटरजेट प्रणोदन प्रणाली से संचालित किया जाता है तथा इसमें अत्याधुनिक टॉरपीडो, पनडुब्बी रोधी रॉकेट, उन्नत रडार और सोनार लगाए गए हैं।
- मंगरोल की भारतीय नौसेना को सुपुर्दगी भारत की स्वदेशी जहाज निर्माण यात्रा में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि है और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के सरकार के दृष्टिकोण की पुनः पुष्टि करती है।
स्रोत: PIB